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कभी थे महज 2 सांसद, आज दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी है भाजपा

नई दिल्ली. महज दो सीटों से शुरू हुआ भारतीय जनता पार्टी का सफ़र आज वोटों के सैलाब में तब्दील हो चुका है. केंद्र की सत्ता के साथ-साथ देश के अधिकांश राज्यों में भाजपा की सरकार है. पिछले कुछ सालों या कहें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राज्य की राजनीति से निकलकर केंद्र की सियासत में आने के बाद से भाजपा बुलंदी पर पहुंच गई है और आज यह विश्व की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में पहचानी जाती है.

हालांकि, इस मुकाम तक पहुंचने के लिए पार्टी को काफी संघर्ष करना पड़ा, एक समय ऐसा भी आया जब उम्मीद को नाउम्मीदी के काले बादलों ने ढंक लिया. लेकिन जिस तरह हर रात के बाद सुबह होती है, भाजपा के भाग्य का सूरज भी चमका और वह एक के बाद एक जीत दर्ज करती चली गई. आज भाजपा ने अपने गठन के 37 वर्ष पूरे कर लिए हैं, और उसका प्रदर्शन किसी युवा की तरह ही है. उसके पास विज़न है, वो उत्साह से लबरेज है और सबसे ज़रूरी वह जानती है कि किस तरह लोगों को साथ लेकर चला जाता है.

पार्टी के इस मुकाम तक पहुँचने के संघर्ष को समझने के लिए हमें इतिहास के पन्नों को पलटना होगा. भाजपा का जन्म भारतीय जनसंघ से हुआ है, या कह सकते हैं कि जन्म से पहले भाजपा को भारतीय जनसंघ के नाम से जाना जाता था. भारतीय जनसंघ की स्थापना श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1951 में की थी.

7वीं लोकसभा के चुनाव में जनसंघ को मिली शिकस्त के बाद 6 अप्रैल 1980 को भाजपा अस्तित्व में आई और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को इसकी कमान सौंपी गई. हालांकि, पार्टी की शुरुआत उम्मीदों के अनुरूप नहीं रही और उसे 1984 के लोकसभा चुनाव में महज 2 सीटों से संतोष करना पड़ा. यह वो समय था जब भाजपा को अपनी रणनीति में अमूलचूक बदलाव करने पड़े. आला नेताओं ने तय किया कि कांग्रेस पर ज्यादा हमलावर होने के साथ ही जातिगत एवं धार्मिक आधार पर पार्टी को मजबूत करना होगा.

इसके पहले चरण के रूप में बोफोर्स घोटाले पर कांग्रेस पर चौतरफा हमला किया गया. 1986 में लालकृष्ण आडवाणी को भाजपा का अध्यक्ष नियुक्त किया गया. अहम रणनीति के तहत 1989 के चुनाव में विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व वाले जनता दल की सरकार बनवाने के लिए भाजपा ने उसे समर्थन दिया. इस चुनाव में पार्टी ने अप्रत्याशित बढ़त दर्ज करते हुए 89 सीटों पर जीत हासिल की.

बनी सबसे बड़ी पार्टी
सीटों के आंकड़ों में आये ज़बरदस्त उछाल के साथ पार्टी नेताओं के मनोबल में भी उछाल आया और वह बाहर से समर्थन देने के बजाये खुद सरकार चलाने की तैयारियों में जुट गये. इसी के तहत 1990 में लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में राममंदिर को प्रमुख मुद्दा बनाने के लिए सोमनाथ से अयोध्या तक रथ यात्रा निकाली गई.

यह वो दौर था जब राम मंदिर को लेकर देश में माहौल बन रहा था. आडवाणी की यात्रा ने इस माहौल को और गर्म किया, जिसका नतीजा यह हुआ कि 1991 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 121 सीटें मिलीं, लेकिन बहुमत के लिए यह आंकड़ा कम था. लिहाजा सरकार में आने का उसका सपना पूरा नहीं हो सका. मगर इस आंकड़े ने पार्टी कार्यकर्ताओं में एक नई ऊर्जा का संचार ज़रूर किया. 1996 के चुनाव में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. राष्ट्रपति के बुलावे पर भाजपा ने सरकार भी बनाई, परंतु वह ज्यादा दिन नहीं चल सकी. महज 13 दिनों में ही अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार बहुमत न होने के चलते गिर गई. 1998 में एक बार फिर से भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सामने आई, उसके 183 सांसदों ने जीत हासिल की, लेकिन भाग्य ने इस बार भी उसका ज्यादा साथ नहीं दिया.

इतने राज्यों में है सरकार
1990 में भाजपा ने 20 से ज्यादा दलों को मिलाकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी राजग का निर्माण किया और साथ मिलकर लोकसभा का चुनाव लड़ा. इस गठबंधन को 294 सीटें मिलीं, जिसमें से भाजपा को अकेले 182 पर जीत हासिल हुई. इस बार अटल बिहारी के नेतृत्व में सरकार पूरे पांच साल चली.

हालांकि, 2004 में पार्टी का इंडिया शाइनिंग का नारा जनता को नहीं लुभा पाया. भाजपा को इस चुनाव में 144 सीटें मिलीं और कांग्रेस ने मनमोहन सिंह के नेतृत्व में गठबंधन की सरकार बनाई. इसके बाद से पार्टी लगातार कमजोर होती चली गई. गुटबाजी और आपसी मनमुटाव ने पार्टी को कमजोर किया और यह कमजोरी नरेंद्र मोदी के केंद्रीय राजनीति में कदम रखने के साथ ही ख़त्म हुई. 2014 में भाजपा ने मोदी के नेतृत्व में लोकसभा चुनाव में 282 सीटों के साथ प्रचंड जीत हासिल की.

ऐतिहासिक जीत के बाद पार्टी की कमान अमित शाह को सौंपी गई और उनकी चाणक्य नीति के चलते आज देश के 17 राज्यों में भाजपा और उसके सहयोगी दल सरकार चला रहे हैं. फ़िलहाल जेपी नड्डा भाजपा के अध्यक्ष की ज़िम्मेदारी संभाल रहे हैं.