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गोण्डा-परिवार व समाज की वुनियाद है वुजुर्ग- डॉ. संतोष मिश्र

करनैलगंज (गोण्डा)। डॉ राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय फैजाबाद के समन्यक डॉक्टर समीर सिन्हा व जनपद गोंडा के नोडल अधिकारी डॉ जितेंद्र सिंह के कुशल मार्गदर्शन में बैकुंठ नाथ महाविद्यालय कर्नलगंज गोंडा के राष्ट्रीय सेवा योजना के तत्वाधान में स्वयंसेवकों ने वृद्धों एवं असहाय व्यक्तियों की सेवा करने का संकल्प लिया और घर घर जाकर वृद्धों की समस्याएं पूछा और हर प्रकार की सेवा करने संकल्प लिया। खुशबू शिवानी एवम बबली ने बूढ़ी माता को खाना खिलाया। प्रदीप ने गर्मी से बचने के लिए बूढ़े व्यक्ति को धोती और अंगोछा दिया। और साबुन से हाथ धोने की सलाह दी साथ साथ यह भी बताया घर में रहे सुरक्षित रहे सामाजिक दूरी बनाये रखें तभी वैश्विक महामारी कोरोना से मुक्ति पा सकते है।

हारेगा कोरोना मुस्करायेगा भारत। कार्यक्रमधिकारी डॉ. संतोष मिश्र ने कहा कि सेवा मानवता का धर्म है यह सद्गुण केवल इंसानों में ही पाया जाता हैं। पशुओं में सेवा की प्रवृत्ति नहीं होती है। एक इन्सान जब वृद्ध हो जाता है और उसका शरीर भी साथ नहीं देने लगता है। तो जो व्यक्ति उनकी सेवा चाकरी करती है उसे सेवा कहा जाता हैं। यह एक प्रकार की ऋण अदायगी एवं परोपकार से प्रेरित कर्म हैं जो हरेक मानव को पूर्ण निष्ठां के साथ निभाना चाहिए। हमारे वैदिक ग्रंथों में बेसहारा की मदद को ही सच्ची सेवा माना गया हैं। इस तरह वृद्ध माता पिता का शरीर शिथिल या बीमार होने से आश्रित अथवा बेसहारा हो जाते हैं। ऐसे वृद्ध लोगों की सेवा को ईश्वर की सेवा के समतुल्य माना गया हैं। वृद्ध जन हमारे परिवार की शोभा, ज्ञान के भंडार रुपी धरोहर होते हैं।

जीवन के विपरीत हालातों में वे हमें अपने जीवन अनुभव का लाभ प्रदान करते हैं। हमारे लिए वो किसी धरोहर से कम नहीं हैं, मगर व्यस्त जीवन में आजकल की संतानें अपने बूढ़े माँ बाप की सेवा या सम्मान का ख्याल नहीं करते है जिस कारण उन्हें दर दर की ठोकरे खाने के लिए विवश होना पड़ता हैं।

“परिवार व समाज की बुनियाद हैं बुजुर्ग,
गहरी सोच व अनुभव के भंडार हैं बुजुर्ग,
सफलता की कुंजी, श्रद्धा के पात्र हैं बुजुर्ग,
हमारे समग्र विकास के चिंतक हैं बुजुर्ग ।”

वृद्धावस्था जीवन की एक अवस्था और न झुटलाई जाने वाली कटु सच्चाई हैं। आज उम्रः के इस पडाव से हमारे वृद्ध गुजर रहे है कुछ दशक बाद इसी माजरे से हमें गुजरना हैं। वृद्ध जो आज है एक समय में ये भी युवा थे, कर्मशील थे इनके भी शौक व सपने थे। हमें उनकी सेवा के साथ ही उनके सम्मान का भी ख्याल करना चाहिए। क्योंकि कहा जाता है बूढ़े इंसान का दिल बच्चों जैसा भोला होता हैं।

वृद्ध लोगों के अनुभव का लाभ उठाए जाए तो यह समाज व राष्ट्र की प्रगति, समृद्धि में कल्याणकारी साबित हो सकता हैं। हमें अपने बालपन की उन यादों को ताजा करना चाहिए जब हमने इन्ही बुजुर्गों की अंगुली पकड़कर चलना सीखा था, इन्ही के कंधों पर बैठकर स्कूल जाया करते थे। जब हम अपने पैरों पर खड़े होने के लायक बने तो दुनियां की रिवायत बदलकर उनके सम्मान एवं एहसान की खातिर ही कुछ अच्छा करे वर्ना आज तो बुड्ढों को असहाय अवस्था में दो चीजे ही मिलती है पहली डाट फटकार और दूसरा वृद्धाश्रम.

“भारतीय संस्कृति के संरक्षक हैं बुजुर्ग,
हमारे संरक्षक एवं मार्गदर्शक हैं बुजुर्ग,
सिर्फ व सिर्फ सम्मान के भूखे हैं बुजुर्ग,
परिवार व समाज की शान हैं बुजुर्ग ।”