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प्रतापगढ़-अब गांवों में मड़राने लगा है करोना संक्रमण का खतरा

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सांगीपुर, प्रतापगढ़। वकील परिषद के पूर्व उपाध्यक्ष एवं वरिष्ठ साहित्यकार परशुराम उपाध्याय सुमन ने कहा कि पूरा विश्व, वर्तमान समय में *कोरोनावायरस* जैसी महामारी का शिकार हो गया है। तमाम बीमार होकर अस्पतालों में भर्ती हो रहे हैं, तमाम लोग मर रहे हैं। चीन, अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, फिलीपींस, पाकिस्तान, तुर्किस्तान आदि देशों के अलावा *भारत* में भी इस महामारी ने अपना पांव पसारने में कसर नहीं छोड़ रखी है। फिर भी अन्य देशों की अपेक्षा भारत की नियंत्रण वाली स्थिति विश्व में चर्चा का विषय बनी है।
*केंद्र की मोदी सरकार* ने अग्रिम निर्णय लेकर *लॉक डाउन* की घोषणा करके अन्य देशों की अपेक्षा *कोरोना* *संक्रमण* की बढ़ोतरी को रोकने में काफी हद तक कामयाबी हासिल कर ली है। प्रदेश का स्वास्थ्य विभाग और पुलिस विभाग, अपनी जान जोखिम में डालकर बड़ी मुस्तैदी से इस महामारी से निपटने का प्रयास कर रहा है, लेकिन उत्तर प्रदेश की योगी सरकार व उनके जनपदों के प्रशासनिक अधिकारियों की सजगता एवं सुनियोजित व्यवस्था के फलस्वरूप कोरौना के संक्रमण का प्रभाव कम होता हुआ फिलहाल शहरों में ही अधिक दिखाई पड़ा।
*गत 25 मार्च 2020* से चल रहे *लॉकडाउन* के कारण सरकारी कार्यालयों के अलावा औद्योगिक प्रतिष्ठानों के बंद हो जाने के कारण स्वाभाविक तौर पर श्रमिकों का अपने किराए के मकानों में रहना व खाना पीना मुश्किल हो गया। यद्यपि केंद्र व प्रदेश की सरकारें खानपान सहित तमाम व्यवस्थाएं देने का प्रयास कर रही हैं किंतु इसके बावजूद बढ़ रहे संक्रमण और आगामी दिनों में *लांकडाउन* के और प्रभावी होने की स्थिति में अब श्रमिकों का किराए के मकान में रहना कष्टप्रद हो गया है और वे एन केन प्रकारेण अपने पैतृक गांव में पहुंचना उचित समझ रहे हैं। व्यवस्था से परेशान सरकारें भी इस निर्णय पर पहुंच गई हैं कि श्रमिकों को उनके पैतृक गांव पहुंचा देना ही सर्वथा उचित है, कम से कम वे अपने परिवार के साथ पैतृक गांव में रहकर *कोरोना* जैसी महामारी के संक्रमण से तो अवश्य बच जाएंगे।
फलस्वरूप शहरों से भारी तादाद में श्रमिकों का अपने पैतृक गांव की ओर प्रस्थान शुरू हो गया है, जिससे इस महामारी से *बेफिक्र गांव में अब कुरौना* *के संक्रमण का* *खतरा मड़राने लगा है।* शहरों से श्रमिक जिस गांव में पहुंच रहे हैं, वहां दहशत का माहौल भी दिखाई पड़ रहा है। लोग भयभीत हैं और उन्हें प्रतिपल आशंका है कि तकहीं ये शहर से आने वाले श्रमिक, गांव में भी *कोरोनावायरस* की महामारी का फैलाव न कर दें।
गांव में प्रबुद्धजनों में इस बात का चिंतन होने लगा है कि *कोरोनावायरस* जैसी भयंकर महामारी का प्रकोप इतनी भयावह स्थिति में क्यों पहुंच रहा है?
चर्चाओं का निष्कर्ष निकला है कि आज *मानवता न जाने कहां* *किस गुफा में अदृश्य होती* *दिख रही है।* मानव, जानवर की भूमिका मैं पहुंच चुका है। अनाचार, दुराचार, भ्रष्टाचार, व्यभिचार, पापाचार आदि कर्मों की सर्वत्र बढ़ोतरी दिख रही है। बल्कि यूं कहिए की अधर्म ने पूरी तरह से अपना आधिपत्य कायम कर लिया है। विश्व में हो रहे धार्मिक कार्यक्रम, अधर्म के आगे बौने साबित हो रहे हैं। सामाजिक कुरीतियां चरम सीमा पर पहुंच चुकी है। खानपान ने तो हद ही कर दी है । हाथ पांव धोकर भोजन करने के स्थान पर जूता, चप्पल पहन बफरसिस्टम (कुकुर भोज) में सभी एक दूसरे का जूंठा खाने लगे हैं। हरे पेड़ों की कटाई धड़ाधड़ हो रही है। भजन कीर्तन लगभग बंद हो चुके हैं। भाईचारा और आपसी सौहार्द कमजोर हो चुके हैं। माहौल ईर्ष्या द्वेष की चरम सीमा पर पहुंच चुका है। लोग एक दूसरे का सम्मान करने में कोताही कर रहे हैं। परिवारों में दादा, दादी, काका, काकी, भैया, भौजी, बहन, बुआ, मौसा, मौसी, चाचा, चाची, आदि का रिवाज खत्म होता दिख रहा है। माता पिता का सम्मान कमजोर हो गया है। युवाओं में मनमानापन दिख रहा है।मौसम का मिजाज भी समझ में नहीं आ रहा है। यह कहा जा सकता है कि प्रकृति ही नाराज चल रही है और अपना संतुलन खोते हुए उथल-पुथल मचाना शुरू कर दिया है। कुल मिलाकर परिणाम अच्छे नहीं दिख रहे हैं। भविष्य बहुत ही भयावह स्थिति में पहुंचने वाला है।
ऐसी स्थिति में हर व्यक्ति को चिंतन, मनन करना होगा कि हमारा अस्तित्व कैसे बचें और हम , खुशहाली के वातावरण में पहुंचकर कैसे अपना जीवन बिता सकें।
बहरहाल, *सरकारें भले ही* *लांकडाउन का निर्णय* *वापस ले लें* , किंतु इसके बाद भी हर जागरूक व्यक्ति को और अधिक सतर्कता बरतते हुए अपनी सुरक्षा स्वयं करनी होगी। घर में रहकर प्रभु का चिंतन करना होगा। विशेष परिस्थितियों में ही घर से बाहर निकलने पर मास्क लगाना अथवा अंगौछे से मुंह नाक पूरी तरह से ढंकना आवश्यक होगा। सामाजिक दूरी (Social Distancing) बनाए रखना होगा। तभी *कोरोनावायरस महामारी* के संक्रमण से बचा जा सकेगा।रिपोटॅ,डा.आर.आर.पाण्डेय प्रतापगढ़।