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हर कोई देखना चाहेगा फिल्म अभिनेता राजकुमार के अभिनय से सजी ये पांच फिल्में

1. नीलकमल रिलीज़ दिनांक: 24 मार्च 1947

नीलकमल प्रदर्शित हिन्दी भाषा की फिल्म है जिसमें वहीदा रहमान, राज कुमार, मनोज कुमार व ललिता पवार मुख्य भूमिका में है. एक महान मूर्तिकार चित्रसेन के काम से खुश होकर राज्य का महाराजा उससे मनोवांछित वर मांगने के लिए कहता है वर में चित्रसेन राजकुमारी नील कमल को मांग लेता है उसके दुसाहस से क्रोधित होकर राजा उसे जिंदा दीवार में चिनवा देता है। अगले जन्म में जब नील कमल सीता के रूप मे जन्म लेती है तो चित्रसेन की आत्मा उसे रातों में पुकारती है और वह अपना होश खोकर आवाज़ की ओर चल देती है।

2. सौदागर रिलीज़ दिनांक: 9 अगस्त 1991 (भारत)

इस फ़िल्म के निर्देशन और निर्माण सुभाष घई द्वारा किया गया। इसमें हिन्दी सिनेमा के दो वरिष्ठ अभिनेता दिलीप कुमार और राज कुमार मुख्य भूमिकाओं में हैं। ये पैगाम (1959) के बाद दूसरी फिल्म थी जिसमें दोनों नजर आए।[1] ये दो नए कलाकार विवेक मुशरान और मनीषा कोइराला की पहली फिल्म थी। अनोखा अंदाज़ मनीषा की पहली फिल्म होने वाली थी लेकिन वो देरी से 1995 में जारी हुई।

फिल्म की कहानी दो जिगरी दोस्तों पे केंदित है। साथ ही इसमें रोमियो और जूलियट से समानताएँ पाई गई। फिल्म सफल रही थी और ये दिलीप कुमार की आखिरी प्रमुख फिल्म रही। इसके गीत भी प्रसिद्धी पाए थे

3. तिरंगा रिलीज़ दिनांक: 29 जनवरी 1993 (भारत)

की भारतीय हिन्दी फिल्म है। मुख्य भूमिकाओं में राज कुमार, नाना पाटेकर हैं। फिल्म के निर्देशक और निर्माता मेहुल कुमार हैब्रिगेडियर सूर्यदेव सिंह और पुलिस इंस्पेक्टर शिवाजीराव वाघले को दुष्ट प्रलयंत को मारने के लिए नियुक्त किया जाता है, जिसने अधिकारी रुद्रप्रताप चौहान की हत्या की है और भारत से बचकर विदेश भागना चाहता है।

4. मदर इण्डिया रिलीज़ दिनांक: 14 फ़रवरी 1957 (भारत)

इस फ़िल्म को महबूब ख़ान द्वारा लिखा और निर्देशित किया गया है। फ़िल्म में नर्गिस, सुनील दत्त, राजेंद्र कुमार और राज कुमार मुख्य भूमिका में हैं। फ़िल्म महबूब ख़ान द्वारा निर्मित औरत (१९४०) का रीमेक है। यह गरीबी से पीड़ित गाँव में रहने वाली औरत राधा की कहानी है जो कई मुश्किलों का सामना करते हुए अपने बच्चों का पालन पोषण करने और बुरे जागीरदार से बचने की मेहनत करती है। उसकी मेहनत और लगन के बावजूद वह एक देवी-स्वरूप उदाहरण पेश करती है व भारतीय नारी की परिभाषा स्थापित करती है और फिर भी अंत में भले के लिए अपने गुण्डे बेटे को स्वयं मार देती है। वह आज़ादी के बाद के भारत को सबके सामने रखती है।