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आलिया की ‘डियर जिंदगी’ को पूरे हुए 4 साल, डायरेक्टर गौरी शिंदे ने खोला फिल्म से जुड़ा ये बड़ा राज!

साल 2016 में आई फिल्म ‘डियर जिंदगी’ (Dear Zindagi) ने बहुत से लोगों को जिंदगी जीने के गुण सिखाए हैं. युवाओं में इस फिल्म को लेकर जो क्रेज था वो देखते बंता था. आलिया भट्ट (Alia Bhatt) ने फिल्म में एक ऐसी युवती का किरदार निभाया था जो रिलेशनशिप और निजी जिंदगी में उथल-पुथल के दौर से गुजरती है और फिर थेरेपिस्ट के रूप में शाहरुख खान (Shah Rukh Khan) उन्हें मानसिक अस्थिर्ता के फेज से थेरेपी के जरिये बाहर निकालने की कोशिश करते हैं. फिल्म ने मेंटल हेल्थ (Mental Health) जैसे इतने महत्वपूर्ण विषय को उठाया था जिसपर हमारे समाज में लोग कम ही बात करते हैं. इस फिल्म में ये दर्शाया गया था कि कैसे युवा भी मांसिक तौर पर असंतुलन के दौर से गुजरते हैं और उस वक्त उनका साथ देना कितना जरूरी होता है.

फिल्म की रिलीज के 4 साल बाद निर्देशक गौरी शिंदे (Gauri Shinde) ने फिल्म से जुड़ा एक बड़ा खुलासा किया है. एक न्यूज वेबसाइट को दिए इंटरव्यू में गौरी ने बताया कि फिल्म के आखिरी सीन में जब शाहरुख खान कुर्सी पर बैठते हैं तो वो आवाज क्यों करती है. गौरी ने अपने नजरिए से समझाते हुए कहा- एक थेरेपिस्ट भी इंसान ही होता है. वो रोबोट नहीं है जिसमें भावनाएं नहीं हैं और जो सिर्फ अपना काम करता है. डॉ. जग (शाहरुख खान के किरदार का नाम) भी एक इंसान था. उसमें भी भावनाएं थीं. अंत के सीन में कुर्सी के आवाज करने के यही मायने थे कि उसने भी एक जुड़ाव और लगाव महसूस किया. अगर कोई प्रोफेशनल है तो इसका ये मतलब नहीं है कि वो किसी चीज को लेकर कुछ महसूस ना करे.”
गौरी ने कहा कि फिल्म में शाहरुख का वैसा महसूस करना स्वभाविक था क्योंकि थेरेपिस्ट भी इंसान होते हैं. उसके मन में जो भाव उठे वो अफेयर या प्यार वाला लव नहीं था बल्कि वो बहुत प्योर था जो उसने कायरा (आलिया भट्ट के किरदार का नाम) के साथ महसूस किया था.

गौरी ने इंटरव्यू में बताया कि इस फिल्म के बाद उनको कई डॉक्टर और मनोवैज्ञानिकों ने मेल लिखकर इस फिल्म को बनाने के लिए धन्यवाद दिया था. गौरी ने कहा कि वो इस फिल्म के लिए खुद पर बहुत गर्व करती हैं. ये फिल्म उनके दिल के बहुत नजदीक है. और इस फिल्म को वो अपने बच्चे की तरह प्यार करती हैं.

फिल्म की निर्देशक गौरी शिंदे की कहानी को कहने की कला ने फिल्म को युवाओं में काफी लोकप्रिय बनाया था. गौरी ने डिप्रेशन जैसी बड़ी परेशानी को दर्शाने के साथ-साथ थेरेपी को इतनी सहजता से दिखाया था जो तारीफ के काबिल है. हमारे समाज में मेंटल हेल्थ के लिए थेरेपिस्ट की सलाह लेने को टैबू की तरह माना जाता है मगर इस फिल्म में एक मरीज और डॉक्टर के रिश्ते को जैसे दिखाया गया उसने लोगों को सोचने का एक नया नजरिया दिया.