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भोपाल- कांग्रेस और बीजेपी के बीच सीधा मुकाबला…

भोपाल-  मध्य प्रदेश में तीन विधानसभा और एक लोकसभा सीट के उपचुनाव में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच सीधा मुकाबला रहा है. इस मुकाबले में कांग्रेस न महंगाई को मुद्दा बना सकी और न ही भारतीय जनता पार्टी अपने मूल कार्यकर्ता की नाराजगी को पूरी तरह समाप्त कर सकी. सालभर के भीतर मध्य प्रदेश में यह तीसरी बार है जब, उपचुनाव हो रहे हैं. पिछले साल दिवाली से पहले 28 सीटों के विधानसभा उपचुनाव हुए थे. इसके बाद दमोह में विधानसभा का उपचुनाव हुआ.

भारतीय जनता पार्टी के लिए यह सभी उपचुनाव किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं रहे हैं. मुख्यमंत्री सहित पूरी सरकार और पार्टी का संगठन इन चुनावों को एक युद्ध की तरह लड़ रहा था. वैसे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की शैली आक्रमक ढंग से चुनाव लड़ने की है. चौहान ने अपनी चिर-परिचित रणनीति के तहत भूमिहीन को जमीन देने का मुद्दा जमकर उछाला.

जोबट और पृथ्वीपुर सीट के परिणाम दमोह से अलग?

भाजपा के भीतर इस मुद्दे पर खलबली मची हुई है कि दूसरे दलों से आए नेताओं की पूछपरक पार्टी में ज्यादा हो रही है. यद्यपि पार्टी के नेता कार्यकर्ताओं की नाराजगी को यह कहकर ढंकने की कोशिश करते रहे कि व्यापक जनाधार के लिए किए जा रहे प्रयास को कार्यकर्ता समझता है.

 कमलनाथ क्यों रहे निशान पर?

मध्य प्रदेश में वर्ष 2018 में हुए विधानसभा के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने अपनी पंद्रह साल पुरानी सरकार गंवा दी थी. भाजपा की सरकार में वापसी ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थक विधायकों के पार्टी में शामिल होने के कारण संभव हो पाई थी. भाजपा को विधानसभा के आम चुनाव में 109 सीटों पर सफलता मिली थी. जबकि, साधारण बहुमत के लिए 116 सीटों की जरूरत होती है. कांग्रेस पार्टी को 115 सीट ही मिली थीं. साधारण बहुमत के लिए उसे बहुजन समाजवादी पार्टी और निर्दलीयों का समर्थन लेना पड़ा था. कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व कमलनाथ ने किया और वे केवल पंद्रह माह ही सरकार को चला सके. भारतीय जनता पार्टी और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस चुनाव में अपनी सरकार के कामकाज से ज्यादा कांग्रेस पार्टी के भीतर चल रही उठापटक को मुद्दा बनाया. उपचुनाव के प्रचार में भाजपा के नेता लगातार यह संदेश वोटर के बीच देने की कोशिश करते रहे कि कांग्रेस पार्टी अब समाप्ति की ओर है. उसके पास नेतृत्व की कमी है.

कमलनाथ किसी को आगे नहीं बढने दे रहे?

भाजपा की इस रणनीति के पीछे बड़ी वजह उसके भीतर ही कार्यकर्ताओं में उभर रहे असंतोष को दबाना रहा. भारतीय जनता पार्टी काडर बेस पार्टी है, लेकिन, पिछले कुछ सालों से वह अपने जनाधार को बढ़ाने के लिए दूसरे दलों के नेताओं को स्थान देने से भी परहेज नहीं कर रही है.

हांडी के चावल की तरह मिलेंगें संकेत

विधानसभा के उपचुनाव राज्य के तीन अलग-अलग अंचलों में हो रहे हैं. एक लोकसभा और 3 विधानसभा सीटों के परिणाम कई मायने में दिलचस्प रहने वाले हैं. हांडी के एक चावल की तरह इनसे भविष्य के मुद्दे सामने आ जाएंगे. राज्य के मालवा- निमाड़ अंचल में आदिवासी वोटर काफी निर्णायक माने जाते हैं. खंडवा लोकसभा सीट आठ विधानसभा क्षेत्रों को जोड़कर बनी है. एक तरह से देखा जाए तो राज्य के कुल 11 विधानसभा क्षेत्रों के वोटरों का मूड परिणामों में दिखाई देगा. कांग्रेस पार्टी की रणनीति मालवा -निमाड़ अंचल में आदिवासी वोटो के भरोसे दिखाई दी. इसी अंचल के जोबट विधानसभा क्षेत्र में भी उपचुनाव है. आदिवासियों के लिए सुरक्षित है. क्षेत्र में भाजपा की पकड़ कमजोर है. यह संदेश इस बात से चला गया कि उसने कांग्रेस की पूर्व मंत्री रही सुलोचना रावत को उम्मीदवार बनाया.

भाजपा नेतृत्व खुश, कार्यकर्ता निराश

मालवा-निमाड़ अंचल में भारतीय जनता पार्टी को विधानसभा के आम चुनाव में आशाजनक सफलता नहीं मिली थी. जोबट में भाजपा को बाहरी पर भरोसा करना पड़ा. वहीं खंडवा में उसे कांग्रेस के भीतर के असंतोष से उम्मीद है. खंडवा में कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अरुण यादव की नाराजगी और उनके बयान को भाजपा ने खूब प्रचारित किया. इस मुद्दे ने काम किया यह इस बात से भी स्पष्ट हो जाता है कि पार्टी के बड़वाह विधायक चुनाव के बीच में ही भाजपा में शामिल हो गए. भाजपा नेतृत्व खुश है और बड़वाह का कार्यकर्ता निराश. आने वाले दिनों में एक और उपचुनाव की जमीन भाजपा ने तैयार कर ली. यह उपचुनाव भी गैर भाजपाई के लिए होगा. उपचुनाव वाली विधानसभा सीट पृथ्वीपुर कांग्रेसी और रैगांव भारतीय जनता पार्टी के प्रभाव वाली सीट है. भाजपा ने पृथ्वीपुर में सीट को जीतने के लिए बाहरी शिवपाल यादव को टिकट देने का प्रयोग किया. भाजपा नेतृत्व इसे टाल सकता था. कारण उप चुनाव किसी दलबदल के कारण नहीं हो रहे. विधायक के निधन के कारण हो रहे हैं. पार्टी टिकट को लेकर किसी वचन से बंधी हुई नहीं थी. अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित रैगांव सीट पर कांग्रेस, भाजपा के भीतर उभर रहे असंतोष में अपनी जीत की राह देख रही है. कांग्रेस का विश्वास अनुसूचित जाति के वोटरों के कारण भी है.

कम मतदान से किसे होगा नुकसान

आमतौर पर विधानसभा अथवा लोकसभा के उपचुनाव के नतीजे उस राजनीतिक दल के पक्ष में रहते हैं जिसकी सरकार राज्य में में होती है. भारतीय जनता पार्टी ने वोटरों के बीच यह संदेश भी दिया कि यदि विपक्षी दल का विधायक चुना जाता है तो नुकसान क्षेत्र का ही होगा. चुनाव में बड़े-बड़े वादे और दावे भी भाजपा की ओर से किए गए. पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने अपनी चुनावी सभा में इस बात को स्पष्ट रेखांकित किया कि नतीजों से राज्य की भाजपा सरकार नहीं गिरना है और ना ही कांग्रेस सरकार बना सकती है. विजयवर्गीय ने चेताते हुए कहा कि- ऐसे में वोटर किसी कारण से भाजपा के खिलाफ वोट देता है तो असर विकास कार्यों पर पड़ेगा. वैसे राज्य में भाजपा की सरकार होने के बाद भी दमोह का वोटर उपचुनाव में कांग्रेस के विधायक को चुन कर विधानसभा मे भेज चुका है. दमोह में पार्टी के मूल कार्यकर्ता की उपेक्षा हार की बड़ी वजह बनी थी. वोटर का फैसला चौंकाने वाला भी हो सकता है. उपचुनाव में एक जोबट को छोड़कर अन्य सभी सीटों पर मतदान का प्रतिशत आम चुनाव की तुलना में कुछ कम रहा है. खंडवा लोकसभा सीट पर मतदान प्रतिशत में तेरह प्रतिशत की कमी जरूर चौंकाने वाली है.