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73% युवा सोशल मीडिया के बारे में सोचते हैं निगेटिव, नोटिफिकेशन से हो जाते हैं तंग

 ज्यादातर लोगों का मानना है कि आजकल के युवा रीयल वर्ल्ड की जगह वर्चुअल वर्ल्ड (Virtual World) पर ज्यादा एक्टिव रहते हैं. क्योंकि उनका स्मार्टफोन (Smartphone) पूरे दिन उन्हें बिजी रखता है. हर एक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उनके प्रोफाइल होते हैं, हर बात पर कमेंट करना उनका शगल होता है. लेकिन ये बात क्या वाकई में सच है? ऐसा नहीं है. एक स्टडी के मुताबिक 73 प्रतिशत युवा सोशल मीडिया के बारे में नकारात्मक सोच रखते हैं. उन्हें इनके नोटिफिकेशन से मनोवैज्ञानिक समस्या होने लगी है. ‘द गार्जियन (The Guardian)’ में छपी न्यूज के मुताबिक, अमेरिका के लॉस एंजिलिस की वीडियो प्रोड्यूसर सनायत लारा (Senait Lara) महज 28 साल की हैं. वो लोगों से बातचीत करने में बेहद सहज होती हैं. लेकिन जैसे ही बात फोन या फिर सोशल मीडिया के अन्य प्लेटफॉर्म्स पर आने वाले संदेशों का जवाब देने की आती है, तो उनकी मुश्कल बढ़ जाती है. वो इसमें काफी अनकम्फर्टेबल हो जाती हैं. इसे लेकर उनके फ्रेंड्स भी उन्हें शिकायत करते हैं. इसके बाद सनायत ने अपने इस बिहेवियर को लेकर स्पेशलिस्ट से कंसल्ट किया. तब उन्हें पता चला कि असल में इस तरह के संदेशों और संवाद के बारे में सोचकर ही वे व्यग्र (anxious) हो जाती हैं.

खास बात ये है कि इस तरह की परेशानी, उत्तेजना (Excitement) या एंजाइटी (Anxiety) महसूस करने वाली सनायत अकेली नहीं हैं. बीते साल हुई एक स्टडी में लगभग 73% यूजर्स ने सोशल मीडिया के बारे में नकारात्मक विचार (Negative thoughts) व्यक्त किए थे.

मिलेनियल जनरेशन के लिए समस्या
इस स्टडी के अनुसार, ज्यादातर युवाओं में सोशल मीडिया और टेक्स्ट मैसेजिंग के प्रति एंजाइटी बढ़ रही है. इसका कारण है, सोशल मीडिया, मैसेजिंग ऐप आदि से लगातार आने वाले नोटिफिकेशन है. लोग उन्हें अक्सर अनदेखा भी कर देते हैं . विशेषज्ञों की मानें तो इस तरह की समस्या ‘मिलेनियल जनरेशन’ (वे जो 1980 और 90 के दशक में पैदा हुए) में ज्यादा देखी जा रही है. और ये जनरेशन अब इसे मनोवैज्ञानिक समस्या (Psychological problem) का रूप भी लेने लगी है.

कोरोना के बाद हुई स्थिति खराब
जानकार बताते हैं कि 2019 के बाद कोरोना के दौर ने स्थिति और ज्यादा खराब की है. इस दौरान ऑनलाइन एक्टिविटी में करीब 61% की बढ़त देखी गई. इसका नतीजा ये हुआ कि अमेरिका में ही हर यूजर अब फोन पर आए औसतन 47 मैसेज रोज छोड़ देता है. जबकि 1,602 ईमेल खोलने, पढ़ने की जहमत ही नहीं उठाता.

क्या कहते हैं जानकार
न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान की प्रोफेसर कहती हैं कि इस सिचुएशन से बचाव का एक ही रास्ता है, हदें तय कीजिए. मतलब, एक तरीका ये हो सकता है कि सोने से पहले फोन को दूसरे कमरे में रख दें. अगर आप फोन में अलार्म लगाते हैं, तो इससे बेहतर है कि किसी अलार्म-घड़ी का ही इस्तेमाल कर लिया जाए. इससे रात को सोने से पहले और सुबह उठते वक्त हम फोन से दूर रह सकेंगे. इसी से बहुत मदद मिल जाएगी.