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कभी भारत से भी गरीब था चीन अब कैसे बन गया दुनिया का सबसे अमीर देश

दुनिया की सबसे बड़ी कंसल्टेंट फर्मों में एक मैकेंजी ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि चीन दुनिया का सबसे देश हो गया. अमेरिका पिछड़कर नंबर 02 की पोजिशन पर आ गया है. दरअसल मैकेंजी ने 10 देशों की बैलेंस शीट के आधार पर इस रिपोर्ट को बनाया है. इस पर अभी तक दुनिया की अन्य एजेंसियों ने मुहर नहीं लगाई है लेकिन ये रिपोर्ट बताती है कि अगर दुनिया की संपत्ति बढ़ी है तो पिछले 20 सालों में चीन की संपत्ति में भी बेतहाशा इजाफा हुआ है.

मैकेंजी की रिपोर्ट के अनुसार चीन की वेल्थ यानि संपत्ति वर्ष 2000 के 07 ट्रिलियन डॉलर से बढ़कर 120 ट्रिलियन डॉलर हो गई है. हालांकि मैकेंजी ने ये आंकलन पूरे तौर पर किस तरह किया है, ये स्पष्ट नहीं हो सका है. दुनिया की तमाम अन्य रिपोर्ट के अनुसार फिलहाल चीन 11 ट्रिलियन है, जो जीडीपी पर कैपिटा के अनुसार है. इसमें अमेरिका 18 ट्रिलियन के साथ नंबर एक पर है. भारत 2.26 ट्रिलियन के साथ 07वें नंबर पर है. हालांकि अनुमानित तौर पर इसे 03 ट्रिलियन के करीब बताया जा रहा है. वैसे चीन की छलांग वाकई हैरान करने वाली है.

एक जमाने में भारत की आर्थिक स्थिति चीन की तुलना में बेहतर थी. हकीकत ये है कि 40 साल पहले का चीन, भारत से कहीं ज्यादा गरीब था. उसकी आर्थिक हालत बहुत खस्ता थी. व्यवस्थाएं हिली हुई थीं. देश में गरीबी थी. बड़ी आबादी बुरे हाल में रहती थी. लग्जरी की बात तो वहां सोची ही नहीं जा सकती थी थी.

1978 के बाद तेजी से बदलाव हुआ

वर्ल्ड बैंक (world banik report) की रिपोर्ट कहती है कि तब चीन में भारत से 26 फीसदी ज्यादा गरीब थे. लेकिन 1978 के बाद चीन में तेजी से बदलाव आने लगा. अब वो दुनिया का सबसे अमीर मुल्क माना जा रहा है. चीन के लोग भारत से कई गुना ज्यादा अमीर हो चुके हैं.
वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के अनुसार 1978 के बाद चीन ने एकसाथ कई क्षेत्रों में सुधार के कार्यक्रम शुरू किए, इसके तहत चीन ने अगर उत्पादन और उद्योग धंधों में विकास का तेज काम शुरू किया तो भूमि सुधार, शिक्षा व्यवस्था में विस्तार और जनसंख्या नियंत्रण के कदम उठाए.

तब भारतीय थे कहीं ज्यादा समृद्ध
1978 में जब चीन ने आर्थिक सुधार की शुरुआत की तो वहां प्रति व्यक्ति आय 155 अमेरिकी डॉलर थी जबकि भारत की प्रति व्यक्ति आय तब 210 डॉलर थी. साफ है कि भारत में तब कहीं ज्यादा समृद्धि थी लेकिन आज तस्वीर एकदम बदल चुकी है.

चीन संपन्नता और वैभव के साथ हर क्षेत्र में बहुत आगे जा चुका है. बिना किसी शक के लोग उसे अमेरिका के बाद दुनिया की दूसरी बड़ी ताकत मानने लगे हैं. 1978 के रिफॉर्म ने भारत को चीन के मुकाबले बहुत पीछे धकेल दिया.

चीन में प्रति व्यक्ति आय
भारत में आर्थिक सुधारों का सिलसिला 1991 में से शुरू हुआ. उस दौरान चीनियों की प्रति व्यक्ति आय 331 डॉलर हो गई जबकि प्रति भारतीय की आय 309 डॉलर थी. 2019 अब चीन की प्रति व्यक्ति आय भारत से पांच गुनी ज्यादा है. आंकड़े बताते हैं कि चीन में इस समय प्रति कैपिटा जीडीपी 10,500 डॉलर के आसपास है तो भारत में 2191 डॉलर के करीब.

साल 2015 के आंकड़ों के मुताबिक चीन की प्रति व्यक्ति आय जहां 7,925 डॉलर थी, वहीं भारत की प्रति व्यक्ति आय महज 1,582 डॉलर थी. 25 साल में चीन की प्रति व्यक्ति आय 24 गुना बढ़ी

अब चीनी हमसे कहीं ज्यादा अमीर
कभी हमारी तुलना में गरीब रहे चीनी आज हमसे करीब 5 गुना अमीर हो गए हैं क्योंकि 1991 के बाद से हमारी प्रति व्यक्ति आय सिर्फ 5 गुना बढ़ी तो इस दौरान चीन की प्रति व्यक्ति आय में 24 गुना का बड़ा इजाफा हुआ.

1978 से पहले चीन की इकोनॉमी दुनिया के लिए नहीं ओपन हुई थी. माओ के शासनकाल में दुनिया के लिए चीन ने अपने दरवाजे हर क्षेत्र में ही बंद किए हुए थे. माओ के उत्तराधिकारी देंग जियाओपियांग ने चीन की इकोनॉमी को खोला. फिर उसके बाद उसका विकास और शहरीकरण बहुत तेज रफ्तार से हुआ.
केवल 20 फीसदी लोग शहरों में रहते थे
1978 से पहले चीन की 90 फीसदी आबादी बहुत गरीबी में रहती थी. शहरों में महज 20 फीसदी लोग ही रहते थे. 1978 में चीन सियासी तौर पर चौराहे पर खड़ा था. उसे ये फैसला करना था कि वो सांस्कृतिक क्रांति और चेयरमैन माओ के निधन के बाद किधर जाए. हालांकि माओ की छाप वहां इतनी गहरी थी कि कोई भी बदलाव बहुत मुश्किल था. कम्युनिस्ट पार्टी में चीन के नए फैसले को लेकर लंबी बहस भी चली कि चीन अब किधर जाए.

उस दिन नए चीन का जन्म हुआ
आखिरकार 18 दिसंबर 1978 में चीन के प्रमुख नेता देंग जियाओपेंग ने जवाब दिया. बीजिंग में उस दिन कम्युनिस्ट पार्टी की मीटिंग में उनके विकासशील प्रोग्राम और आर्थिक सुधारों को लागू करने का फैसला लिया गया. इस तरह उस दिन एक चीन का जन्म हुआ. ये चीन की दूसरी क्रांति थी. देंग खुद को लो प्रोफ़ाइल में रखते थे लेकिन उनका पूरा ध्यान चीनी अर्थव्यवस्था को तेज़ी पर लाने पर था.

उस दिन पूरे चीन में जश्न मनाया गया. लोग खुशी मनाते हुए सड़कों पर आ गए. परिवारों ने डिनर टेबल पर शराब की बोतलें खोलीं और एक दूसरे को बधाई दी. इसके 40 साल बाद चीन में सबकुछ बदल चुका है. जब ये शुरुआत हुई तो चीन का दुनिया की अर्थव्यवस्था में हिस्सा महज 1.8 फ़ीसदी था जो 2017 में 18.2 फ़ीसदी हो गया.

दरअसल चीन ने उदारीकरण के लिए पूरा खाका तैयार किया था. चीन के नेताओं ने केंद्रीय नियंत्रण वाले नेतृत्व पर ज़ोर दिया, लेकिन स्थानीय सरकार, निजी कंपनियां और विदेशी निवेशकों के बीच बढिया तालमेल बनाया.

अब कारें ही कारें
पहले चीन की सड़कों पर साइकिलें दिखती थीं. कारें शायद ही नजर आती थीं. अब सड़कें कारों से खचाखच भरी हुई हैं. देशभर में 3000 लाख से ज्यादा रजिस्टर्ड कारें हैं.- अब वहां बाइक और साइकिलें सड़कों पर बहुत कम दिखती हैं. वहां लगातार ट्रैफिक जाम रहता है.

कुलांचे भरती जीडीपी
चीन के बाजार सामानों से पटे नजर आते हैं. चीन की जीडीपी कुलांचे भर रही है. चीन के बाजारों में दुनिया के सबसे बेहतरीन लग्जरी गुड्स बेचे जाते हैं. आज की तारीख़ में चीन दुनिया का वो देश है,जिसके पास सबसे ज़्यादा विदेशी मुद्रा भंडार (3.12 ख़रब डॉलर) है. जीडीपी के आकार के मामले में ये दूसरा सबसे बड़ा देश है. जबकि विदेशी निवेश को आकर्षित करने में दुनिया में तीसरे नंबर पर. कहा जाने लगा है कि चीन मौजूदा समय में मैन्युफैक्चरिंग सुपरपॉवर बनने की ओर बढ़ रहा है. चीन की एक रिपोर्ट कहती है चीन में पिछले 10 महीनों में विदेशी पूंजी निवेश 17.48 फीसदी बढ़ा है.

मैन्युफैक्चरिंग सुपरपॉवर
शी जिनपिंग चीन की अर्थव्यवस्था को और प्रभावी बनाने के लिए मैन्युफ़ैक्चरिंग के मामले में सुपरपॉवर बनाना चाहते हैं. इसके लिए शी जिनपिंग डांग श्याओपिंग की नीतियों को ही आगे बढ़ा रहे हैं, जिनमें अर्थव्यवस्था को खोलना और आर्थिक सुधार जैसे क़दम शामिल हैं.

इसके लिए उसने विशेष आर्थिक क्षेत्र का निर्माण किया. विशेष आर्थिक क्षेत्र के लिए चीन ने दक्षिणी तटीय प्रांतों को चुना. चीन का विदेशी व्यापार 17,500 फ़ीसदी बढ़ चुका है. 2015 तक वो विदेशी व्यापार में दुनिया में अगुवा बन गया. 1978 में चीन ने पूरे साल जितने व्यापार किया था अब वो उतना महज दो दिनों में करता है.

चीन की मैन्युफैक्चरिंग भारत से 1.6 गुना ज्यादा
चीन भारत की तुलना में कहीं ज्यादा सामान का उत्पादन करता है. चीन के श्रमिक भारत की तुलना में 1.6 गुना ज्यादा उत्पादन करते हैं. इसका मतलब ये भी एक देश के तौर पर चीन की उत्पादकता भारत की तुलना में 60 फीसदी ज्यादा है.