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पाकिस्तान के नए अमेरिकी राजदूत मसूद खान कूटनीति में आतंकवाद को क्यों दे रहे हैं बढ़ावा

नई दिल्ली. अमेरिका (US) और संयुक्त राष्ट्र संघ (United Nations) के लिए घोषित आतंकवादियों की सूची हमेशा से ही सिरदर्द रही है. सूची में शामिल आतंकियों को लेकर एक बात का उल्लेख किया गया है, अक्षम्य. यानी ये ऐसे आतंकी हैं, जिन्हें हर हाल में कहीं से भी ढूंढकर निकालना है. फिर चाहे वो अफगानिस्तान (Afghanistan) की तोरा-बोरा की गुफाओं (Tora Bora Caves) में छिपे हों या कोलंबिया की मेडेलिन बस्ती में उन्होंने अपना डेरा जमाया हो. तालिबान ने सितंबर में जो अपनी अंतरिम सरकार की घोषणा की थी, उसमें 33 में से 14 घोषित आतंकियों की सूची में शामिल थे. यहां तक कि जिस शख्स को कानून और व्यवस्था के आंतरिक मंत्री का प्रभार सौंपा गया था, वह हक्कानी नेटवर्क का सिराजुद्दीन हक्कानी (Sirajuddin Haqqani) था, जिसे वैश्विक स्तर पर सबसे वांछित आतंकवादियों में से एक घोषित किया गया है.

तालिबान के कब्जे वाली घटना के बाद खुद को दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति होने का दावा करने वाला अमेरिका यह सोच कर अपना सा मुंह लेकर रह गया और अपमान का घूंट पी गया कि जल्दी ही यह वक्त गुजर जाएगा, लेकिन उसने सोचा नहीं था कि वक्त गुजरता है तो लौटता भी है. उसे अभी और भी बहुत कुछ देखना था. उसे एक बार फिर मजाक का पात्र बनना था. ऐसा तब हुआ, जब तालिबान की कठपुतली रहे पाकिस्तान ने वाशिंगटन में, लंबे समय तक इस्लामिक आतंकवाद के प्रणेता मसूद खान को राजदूत नियुक्त कर दिया.

हाल ही में नेशनल रिव्यू के एक लेख में इस्लामिस्ट वॉच के निदेशन सैम वेस्ट्रॉप ने खान का कच्चा चिट्ठा खोलते हुए उसकी करतूतों और घिनौने कामों को विस्तार से बताया है. ‘आतंकियों का एक समर्थक अब वाशिंगटन की राह पर’ शीर्षक से लिखे हुए लेख में मसूद खान के कश्मीर केंद्रित आतंकी समूहों हिज्बुल मुजाहिद्दीन और लश्कर ए तैयबा के समर्थन के बारे में भी विस्तार से बताया गया है.

नेशनल रिव्यू में छपे लेख में बताया गया है कि खान की चरमपंथियों के प्रति सहानुभूति सिर्फ अपने घर तक सीमित नहीं है. नए राजदूत ने पाकिस्तान के बाहर भी आतंकियों के समर्थकों के साथ काम किया है. लेख में 2019 में पत्रकार अब्दुल्ला बोजकर्ट की मसूद खान की ट्वीट की गई तस्वीरों का हवाला देते हुए लिखा है, तुर्की खुफिया से जुड़ा चैरिटी संगठन #IHH का दौरा, यह वह संगठन है, जिस पर सीरिया और लीबिया में अलकायदा से जुड़े जिहादी समूहों को हथियार भेजने का आरोप है. यही नहीं इस संगठन की कई शाखाएं जर्मनी, नीदरलैंड और इजरायल में आतंकवादी संगठनों की सूची में शामिल की गई हैं.

लेख के आखिर में लिखा गया है कि मसूद खान कट्टर आतंकियों का समर्थक है. वाशिंगटन में उसका होना अमेरिका और दक्षिण एशिया में कट्टरपंथियों की ताकत को बल देगा, क्योंकि वो घोषित आतंकवादियों का खुला समर्थक है. वैसे तो विदेशी राजदूतों को पश्चिमी देश बमुश्किल खारिज करते हैं, लेकिन बाइडन को मसूद के बारे में एक बार विचार जरूर करना चाहिए. वेस्ट्रॉप लिखते हैं कि मसूद की नियुक्ति अमेरिकी इस्लामवाद में पाकिस्तान के प्रभाव को बढ़ावा देगी, बल्कि इससे भारत के खिलाफ पाकिस्तान की इस्लाम संचालित विदेश नीति को भी मदद मिलेगी.

खान ने बार-बार हिज्बुल मुजाहिद्दीन के मारे गए आतंकवादी बुरहान वानी को कश्मीर का लोकप्रिय स्वतंत्रता सेनानी बताया है. उसने खुले तौर पर भारत के खिलाफ जिहाद की वकालत की है. हिज्बुल के सरगना सैयद सलाहुद्दीन पर प्रतिबंधों की खिलाफत की है. हरकत उल मुजाहिद्दीन के संस्थापक फजलुर रहमान खलील के साथ मंच साझा किया है और तुर्की की खुफिया एजेंसियों के एनजीओ के साथ उसका संपर्क रहा है.

यही नहीं अमेरिका में भी वो आईएसआई पोषित अभियान, जो ह्यूस्टन नेटवर्क और जिहादी संगठन जमात ए इस्लामी के दान पर संचालित होता है, उससे भी जुड़ा हुआ है. अमेरिका ने अफगानिस्तान को छोड़ दिया, तालिबान की मदद की, और एक घायल शहर को लकड़बग्घों की शक्ल लिए हुए इस्लामाबाद और रावलपिंडी के हवाले कर दिया. अब वह उसी शासन के एक कट्टरपंथी की मेजबानी भी कर रहा है. इस तरह उसे भारत के खिलाफ नफरत फैलाने और अफगानिस्तान सहित दूसरे देशों में जिहादी एजेंडा चलाने में मदद मिलेगी.

वहीं अमेरिका, अपने दोस्त, सहयोगी राष्ट्र और लोकतांत्रिक दुनिया के साथ गलत कर रहा है, लेकिन क्या वाकई में बाइडन प्रशासन इस बारे में कुछ दिलचस्पी रखता भी है.