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अजमल कसाब: पिता से नाराज होकर घर से भागा, 13 साल पहले मुंबई को किया था लहूलुहान

नई दिल्ली. मुंबई में 26 नवंबर 2008 (Mumbai 26/11 Terror Attacks) को हुए हमले के बाद एक तस्वीर सामने आई थी, जिसमें एक युवक रेलवे स्टेशन पर हाथ में बंदूक लिए नजर आ रहा था. तफ्तीश के बाद इस दहशतगर्द का नाम अजमल आमिर कसाब (Ajmal Amir Kasab) के रूप में सामने आया. यह वही आतंकी है, जिसे मुंबई हमले के दौरान गिरफ्तार कर लिया गया था. बाद में मुकदमा चला और 21 नवंबर 2012 को फांसी दे दी गई थी. अब जानते हैं कि आखिर कौन था कसाब, जो मासूम भारतीयों की जान का दुश्मन बन गया.

मुंबई हमलों के दौरान कसाब की उम्र 21 वर्ष की थी. भारतीय अधिकारियों ने इस आतंकी के बारे में जानकारी जुटानी शुरू की. कई महीनों की मेहनत के बाद पाकिस्तान ने इस बात को स्वीकार किया था कि यह पंजाब प्रांत में रहने वाला उनका नागरिक था. कुछ रिपोर्ट्स में पता चला था कि वह फरीदकोट नाम के दूर-दराज के गांव का रहने वाला था, जहां उसके पिता खाने-पीने की चीजें बेचा करते थे.

नाराज होकर घर से भागा
बीबीसी ने रिपोर्ट्स के हवाले से लिखा कि कसाब ने कम शिक्षा हासिल की थी और उसने अपनी जवानी मजदूरी और छोटे-मोटे अपराधों में गुजारी. पाकिस्तानी मीडिया को दिए इंटरव्यू में फरीदकोट के रहने वाले एक शख्स ने कसाब को अपने बेटे के रूप में पहचाना. उन्होंने बताया कि वह हमले के चार साल पहले घर छोड़कर चला गया था. बीबीसी ने डॉन अखबार के हवाले से लिखा, ‘उसने मुझसे ईद पर नए कपड़े मांगे थे, जो मैं उसे नहीं दे सका. वह नाराज हो गया और चला गया.’

कहा गया कि कसाब लश्कर-ए-तैयबा के प्रभाव में आ गया था. बताया जाता है कि ऐसे ही कैंप में ट्रेनिंग हासिल करने के बाद उसे मुंबई हमले के लिए चुना गया था. हमले की जारी तस्वीरों में कसाब छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर गोलीबारी करता नजर आ रहा है. तस्वीर खींचने वाले फोटोग्राफर बताते हैं, वह ‘ऐसे चल रहा था, जैसे उसे कोई भी छू नहीं सकता.’

मुकदमे से लेकर सजा की कहानी
पुलिस के साथ गोलीबारी के बाद कसाब को जिंदा पकड़ लिया गया. उससे पूछताछ हुई और हत्या व भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने समेत 86 अपराधों में मामले दर्ज किए गए. अभियोजकों ने कहा कि कसाब ने कबूल कर लिया है. जबकि, आतंकी के वकील का कहना था कि बयान उससे जबरदस्ती दिलाया गया है. बाद में इसे वापस ले लिया गया.

साल 2009 में ट्रायल की शुरुआत हुई. इस दौरान कसाब हंसता नजर आ रहा था. मई 2010 में कसाब को विशेष अदालत ने फांसी की सजा सुनायी. जज एमएल तहिलियानी का कहना था, ‘उसे मरने तक गर्दन से लटकाया जाना चाहिए.’ कसाब के वकील ने नरमी बरतने की बात कही और कहा कि आतंकी संगठन ने उनके क्लाइंट का ब्रेनवॉश किया है और उसका पुनर्वास किया जा सकता है. कसाब ने फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की और अक्टूबर 2010 में मामले पर सुनवाई शुरू हुई.

मुंबई हाईकोर्ट की तरफ से फरवरी 2011 में उसकी अपील खारिज कर दी गई, जिसके जवाब में उसने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. 29 अगस्त 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने उसकी अपील खारिज की और मौत की सजा को बरकरार रखा.