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भोजपुरी विशेष: भोजपुरी क ‘बजार’ अउर ‘बजार’ क भोजपुरी

एतना त आप सब जानीला जा की भाषा/बोली समाज से बनेले, समाज से बिगड़े ले. आज मशीन से भरल दुनिया में लोग यही बात पर चरचा करत बा की भोजपुरी क स्थिति कुछ डावाडोल लागत बा? अब गावे आउर लिखे वाला लोग त बढ़ गयल बाड़न जा, लेकिन भोजपुरी क स्तर बहुत ख़राब होत जात बा. फिलिम से लय आउर धुन चुरा के लोगबाग अपने के बड़हर गायक समझत बाड़ें. लेकिन ओकरा में कुछऊ सीखे-जाने लायक नईखे देखात.

टेलीविजन की जमाना से तनी पाहिले क बात देखब त आप के समझे में देर ना लागी कि जबले यह बोली के बोले/सुने/गावे/लिखे वाला लोग समाज खातिर जियत रहे तबले बिरहा अउर ओमई प्रयोग छत्तीसगो धुन बहुत सुन्दर रहे. बिरहा में लिखल कहानी देखब त आप समझ जाईब कि एगो बिरहा में लेखक केतना जतन से कईगो धुन अउरी समस्या के खूब बढ़िया से सजवत रहलन जा. फिर गायक जब ओकरा के गावें तब जनता अनाज बेच के इनाम देवे चल आवे.

उदारीकरण से पाहिले क हाल देखब त लगन (शादी/बियाह) के समय बिरहा, नाच, नौटंकी क मांग एतना अधिक रहे कि जे चार-छह महीना पाहिले से सट्टा ना लिखवावे ओकरा के गवईया ना मिलें. तब दूनो चीज संगे चले. मतलब कि कला खूब उफान पर रहे अउर ओकर कदरदानो कम ना रहले. भोजपुरी बोली में जेवन कला रहे, ओकरी कारन ओकर आपन बजार रहे. तब केहू इ ना कहे वाले रहे कि इ गाना हम लिखले बाड़ी अउरी हमही गयिब आउर हमही बजार में बेचबो करब. लेकिन अब समय बदल गईल बा. आज भोजपुरी क आपन बजार ख़तम हो गईल. ओकरा बजार में शालीनता रहे, ईमानदारी रहे. लोग नाम खातिन काम करत रहलन. पईसा कमयिले की पीछे बहुत कम लोग जाय. जे ओकरी बारे में सोचे लागे, जनता ओकर नाम लेहल बंद करवा दे. लेकिन अब पयिसवे सब बा. भोजपुरी सेवक खाली किताबआउर मंच पर लोग बनत बा. पीछे सब कमाए में व्यस्त बा.

एगो ज़माना रहे कि लोग फसल बेच के नाच करवावत रहलन. नाच में पईसा, सोहरत सब रहल. नाच करे वाला लोग भाषा क खूब इज्जत करत रहलन. हंसी-मजाक, व्यंग से केहू के परहेज ना रहे. काहें से कि ओकरा में जीवन क घटना मर्यादा के गावल जाय आउर लोग सुने/देखे/जाने. अब ओईसन कुछउ ना बचल बा. एकर एगो बड़हर कारण बा पईसा. जे भोजपुरी क झंडा लेके चलत बा उनकरा के बोली क चिंता नईखे.

दुगो बात समझल जरुरी ह. एगो त इ कि भोजपुरी प्रदेश से जेतना लेखक, साहित्यकार लोग निकलल, उ लोग अपने लेखन में त भोजपुरी शब्द क खूब प्रयोग कईलन जा. लेकिन भोजपुरी में कुछऊ ना लिखलन जा. एकर सबसे बड़हर नुकसान इ भईल कि भोजपुरी क समय की संगे तालमेल ना बनल. ओकरा के नया शब्द आउर मुहावरा ना मिलल. आज नयी पीढ़ी ओकरा से पूरा कट गईल बा.

दूसर कि दिखावा बढ़ गईल बा. समस्या की जड़ में केहू नईखे जात. सब अपनी तरह से सोचत-करत बा. आज जेतना आयोजन भोजपुरी के ले के होत बा, ओकरा में आयोजन के समय त संचालक से लेके भागीदारी करे वाला लोग तक खूब भोजपुरी में बोलेला. तारीफ करेला. लेकिन यह कुछ घंटा क बात होले. ओकरी बाद जईसे लोग वहां से निकलेला, सब आपन-आपन काम में लग जाला. भोजपुरी भुला जाले. केहू अंग्रेजी झारेला त केहू हिंदी में भागे पराये लागेला.

गाँव से रोजी-रोजगार खातिर पलायन ढेर बढ़ गईल बा. उदारीकरण की बाद आप देखब कि गाँव से नोकरी आउर पढ़ाई खातिर खूब पलायन बढ़ गईल. कारण इ कि परिवार बड़हर हो गईल आउर आमदनी घट गईल. खेत से जेवन आमदनी होतो रहल ओतना से खईले क काम चलल मुश्किल होखे लागल. येह हालत में जनता के कलकत्ता/बम्बई कमाए जाए के परल. गाँव में रहले पर लोग खेती बारी करे, व्रत-उपवास करे तब सब एक साथ बईठे. गाना बजाना करे. केहू की घरे कवनो कथा/पाठ होखे त लोग गवनई करे. गीत गावे. लेकिन जब सब लोग सहराती होखे लागल त इकुल बंद हो गईल. अब आप देखब की शहर में जे रहत बा ओकरा के काम से फुरसत नईखे. गाना बजाना कहाँ से करी. फिर केहू गावलो चाहे त कईसे गाई. कहीं दू अदमी रहत बाड़ें, त कहीं चार गो. अब दुगो-चारगो आदमी मिल के गाना कहाँ से गई.

गाँव में मेहनत करे वाला लोग कटिया/बिनिया क समय छोड़ के, नियम से बईठकी करत रहलन जा. ओकरा में महीना, समय देख के गवनई होखे. पुरबी, छपरहिया, कजरी, निरगुन, फगुवा त सबके गावे आवे. कईगो गावे वाला त लिखबो करे लोग. केहू पुरनका में जोड़ दे, त केहू चार लाईन क नया बना दे. आप देखब की जेकरा के गावल ना पसंद रहे, फागुन में उहो आके गवनई में बईठे आउर लवंडा क विदाई क समय कुछ ना त अनाज जरुर दे दे. लेकिन अब हालत बदल गईल बा. जे गरीबी में लवंडा क नाच देखे खातिर अनाज देत रहे, उ लोग पईसा त कमाए लागल, लेकिन बोली से प्रेम, गवले-बजवले से लगाव खतम हो गईल. उनकरी उन्नति में हिस्सा त बोलियो के मिले के चाहत रहे, लेकिन कुछ ना मिलल. कुछ लोग पढ़-लिख के इहो कहे लागला कि ‘गवाले-बजावले कुछ ना होई. एसे पेट ना भरी. कहीं चल के दू रुपिया कमयिले क जरुरत बा.’ बदलवाव की येह बयार में बहुत कुछ उजड़ गईल.

पहिले कहानी सुनावे क काम खूब होखे. जईसे अन्हार होखे, घरे में दादी/नानी खटिया पर बईठ जांय, आउर परिवार क कुल लईका कहानी सुने क फरमाईस करे लागें. जे सबसे छोट रहे, ओकर बात पाहिले मानल जाय. उहे कहानी सुनके तब लईका लोग सुतत रहलन जा. लेकिन जबसे रेडियो आउर टीबी क शुरुआत भईल, सबकर स्वाद बदल गईल. लोग फ़िल्मी गाना सुने लागल. हमरी गाँव में नेउरा मामा आवें त पनरह दिन लगातार रहें, आउर गाँव क लोग रात भर जाग के उनकर कहनी सुने. लेकिन अबक लईका येहकुल में रूचि ना लेतन स.

पिछले दू-चार साल से कुछ उम्मीद जागल बा. जईसे कि अब पढ़े वाला लईका लोग फिर से ‘लोक’ की तरफ बढ़त बाड़ें. काहें कि अब खाली शहराती चीज सबके पसंद नईखे आवत. सब जगह बनावटी मामला हो गईल बा. त पढ़ाई-लिखाई की जगह पर बोली/भाषा क साहित्य पढ़ावे क काम शुरू हो गईल बा. उम्मीद बा की आवे वाला समय भोजपुरी सहित कईगो बोली क स्थिति सुधारे क मोका जरुर देई. समझदार लोग ओकरा से जुड़ी त तनी उ और ठीक हो जाई.