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चीन की चुनौतीः आदर्शवाद का समय खत्म, 30-40 साल तक चलने वाला है यह रार

भारतीय मीडिया बॉलीवुड के नशे जैसे छद्म और एक अभिनेत्री, एक एंकर व शिवसेना के नेताओं के बीच फर्जी राष्ट्रवाद पर मची बहस पर कितना भी शोर मचाए लेकिन आने वाला समय चीन केंद्रित विमर्श का होने जा रहा है. पूरी दुनिया का मीडिया और राजनयिक समुदाय उससे बच नहीं सकता. ध्यान रहे कि यह विमर्श कोई एक दो साल नहीं चलेगा. यह उसी तरह 30-40 साल चलने वाला है जैसे कभी अमेरिका और सोवियत संघ के बीच शीतयुद्ध के बहाने बहसें चलती रहती थीं.

अमेरिका और यूरोप से लेकर पूर्वी एशिया तक चीन ने पूरी दुनिया के भूराजनीतिक संतुलन में उथल पुथल मचाने की ठान ली है और भारत से उसका टकराव उस व्यापक रणनीति का महज एक हिस्सा है. अगर चीन और अमेरिका के अखबारों पर गौर किया जाए तो उनके बीच चलने वाले शीतयुद्ध को हमारी सीमाओं पर मची तनातनी से ज्यादा कवरेज मिल रही है. उन्हें देखकर लगता है कि असली टकराव तो चीन और अमेरिका के बीच चल रहा है. इधर भारत, चीन के साथ हर स्तर पर वार्ता करने, मध्यस्थता और संयम बरतने में लगा है लेकिन सीमा पर चीन के सैनिकों का जमावड़ा न तो कम हो रहा है और न ही उधर से तनाव कम करने के लिए ठोस उपाय सामने आ रहे हैं.

ऐसा लगता है कि हम चीन से काफी निश्चिंत हो गए थे वरना अंतरराष्ट्रीय स्तर के राजनय विशेषज्ञों और पंडित जवाहर लाल नेहरू से असहमत रहने वाले हमारे चिंतक राजनेताओं ने चीन के बारे में सदैव सचेत किया है. उनमें `क्लैश आफ सिविलाइजेशन एंड रीमेकिंग आफ न्यू वर्ल्ड आर्डर’ जैसी चर्चित पुस्तक लिखने वाले सैमुअल पी हंटिंगटन की चेतावनी का स्मरण दिलाना जरूरी है. वे 1996 में प्रकाशित अपनी इस चर्चित पुस्तक में लिखते हैं, `पूर्वी एशिया में चीन एक दबंग ताकत के रूप में उभर रहा है. पूर्वी एशिया का आर्थिक विकास अधिकतम चीन केंद्रित होता जा रहा है. इसे चीन की मुख्यभूमि के साथ चीन से जुड़े तीन और विशेष क्षेत्रों के तीव्र विकास से हवा मिल रही है. इसके अलावा इसमें थाईलैंड, मलेशिया, इंडोनेशिया और फिलीपींस जैसे चीन से जातीय घनिष्ठता रखने वाले देशों के विकास की केंद्रीय भूमिका है. चीन दक्षिणी चीन सागर पर तेजी से अपना दावा कर रहा है, पैरासेल द्वीप में अपना आधार तैयार कर रहा है, वियतनाम से छोटे छोटे द्वीपों के लिए उलझ रहा है और फिलीपींस के मिसचीफ रीफ पर सैनिक अड्डा बना रहा है. वह इंडोनेशिया के नाटुना द्वीप के पास के तेल क्षेत्र पर दावा कर रहा है. चीन ने पूर्वी एशिया में अमेरिका की सैन्य उपस्थिति का हल्का समर्थन भी बंद कर दिया है. हालांकि शीतयुद्ध के समय चीन जापान को सैन्य शक्ति बनने के लिए प्रेरित कर रहा था लेकिन उसकी समाप्ति के बाद वह जापान के सैन्य विकास पर चिंताएं जता रहा है.’

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इसके बाद उन्होंने एक सूची देते हुए कहा है कि चीन चाहता है कि पूर्वी एशिया के देश इनमें से सारे बिंदुओं पर उसका समर्थन करें या कम से कम कुछ पर तो करें ही. इन बिंदुओं का उद्देश्य चीन के वर्चस्व को स्वीकार करना है. हंटिंगटन सिंगापुर के तत्कालीन प्रधानमंत्री ली कुआ यू के बहाने से कहते हैं, `चीन का उभार दुनिया के लिए इतना उथल पुथल करने वाला है कि उसे नया संतुलन कायम करने में 30 से 40 साल लग सकते हैं. यह कहना ठीक नहीं है कि यह दुनिया में उभरता हुआ महज एक खिलाड़ी है. बल्कि वह मानव इतिहास का सबसे बड़ा खिलाड़ी है.’ हंटिंगटन फिर लिखते हैं कि अगर चीन की आर्थिक प्रगति इसी रफ्तार से अगले दशक में भी जारी रही, जिसकी संभावना है, और उसकी एकता भी बनी रही, जैसा कि लग रहा है, तो पूर्वी एशिया के देशों को और दुनिया को मानव इतिहास के इस सबसे बड़े खिलाड़ी की दबंग भूमिका को देखते हुए अपनी अपनी जगह तय करनी होगी.

इसी सिलसिले में बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर की वह चेतावनी भी गौर करने लायक है जो उन्होंने चीन के संदर्भ में दी थी. उन्होंने भारत की रक्षा नीति और विदेश नीति के सूत्र प्रतिपादित करते हुए कहा था कि निर्गुट नीति ठीक नहीं है. भारत को अमेरिका समेत पश्चिम के लोकतांत्रिक देशों के साथ घनिष्ठ रिश्ते कायम करने चाहिए क्योंकि हमें एक लोकतांत्रिक देश ही रहना है. उन्होंने भारत को दो राजधानियां बनाने का सुझाव देते हुए कहा था कि दूसरी राजधानी कोलकाता बनाना ठीक नहीं है क्योंकि वह तिब्बत और चीन के करीब है. भारत और चीन के बीच भले दोस्ती दिख रही हो लेकिन टकराव की आशंका कायम है. इसलिए भारत को हैदराबाद को दूसरी राजधानी के रूप में विकसित करना चाहिए.

यह भी पढ़ें: राहुल गांधी ने पूछा,सीमा पर तैनात जवानों और अधिकारियों के खाने में अंतर क्यों?बाबा साहेब ने चीन के साथ नेहरू की तिब्बत संधि पर आपत्ति करते हुए कहा था कि ऐसा करके भारत चीन को अपने दरवाजे तक ले आया है. उन्होंने चीन के साथ हुए पंचशील समझौते पर सवाल खड़ा करते हुए कहा, `मैं हैरान हूं कि प्रधानमंत्री क्या सचमुच पंचशील को गंभीरता से समझते हैं. जैसा कि आप जानते हैं कि पंचशील बौद्ध धर्म का हिस्सा है. अगर माओ की पंचशील में कोई आस्था होती तो क्या वे अपने देश में बौद्ध लोगों के साथ अलग व्यवहार करते. राजनीति में पंचशील के लिए कोई स्थान नहीं है और कम्युनिस्ट देश में तो कतई नहीं है.’ आंबेडकर तिब्बत पर चीन के कब्जे के विरुद्ध थे. उनका मानना था कि 1950 में तिब्बत पर कब्जा करके चीन ने भारत और अपने बीच एक बफर देश को समाप्त कर दिया. बाबा साहेब ने 1952 के लोकसभा चुनाव में शिड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन नामक पार्टी का जो घोषणा पत्र जारी किया उसमें अपनी विदेश नीति स्पष्ट की थी. उन्होंने 20 नवंबर 1956 को काठमांडू में आयोजित चतुर्थ विश्व बौद्ध सम्मेलन में बुद्ध और कार्लमार्क्स पर अपना चर्चित व्याख्यान दिया. उसमें भी उन्होंने साम्यवादी देशों से उत्पन्न खतरों के प्रति सचेत किया था और बौद्ध देशों से जागरूक होने का आह्वान किया था. बाबा साहेब का निधन छह दिसंबर 1956 को हो गया और वे 1962 के चीन भारत युद्ध के समय नहीं थे लेकिन उनकी चेतावनी की रोशनी में 1962 और आज की घटनाओं को देखा जा सकता है.

डॉ. राममनोहर लोहिया की चीन संबंधी चिंताएं बाबा साहेब से मिलती थीं. हालांकि वे एशिया की एकता पर जोर देते समय चीन के परमाणु विस्फोट से खुश भी होते थे. लोहिया भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में विदेश नीति के प्रभारी थे और आजादी से पूर्व चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से कांग्रेस के अच्छे रिश्तों के हिमायती थे.

लोहिया चीन की हमलावर कार्रवाइयों के बारे में नेहरू सरकार को काफी पहले से सतर्क कर रहे थे. जब 1946 में चीन ने तिब्बत को हथियाना शुरू किया तो लोहिया लंदन में थे. उन्होंने एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा, `भारत को इस बाल हत्या को रोकना चाहिए.’ लेकिन वहीं तीन दिन बाद लंदन के कम्युनिस्ट अखबार डेली मिरर ने जयप्रकाश नारायण का बयान छापा जिसमें उन्होंने कहा कि तिब्बत पर चीन का दावा पूरी तरह से वैधानिक है. उनके इस बयान से लोहिया की किरकिरी हुई क्योंकि जयप्रकाश नारायण सोशलिस्ट पार्टी के महासचिव थे. लेकिन लोहिया चीन के इरादों के प्रति लगातार देश और सरकार को सतर्क करते रहे और यह भी दावा करते रहे कि कैलाश मानसरोवर तक भारत का क्षेत्र है. वे अंग्रेजों द्वारा खींची गई मैकमोहन लाइन को नहीं मानते थे. वे चीन के इलाके के एक गांव का नाम लेते थे जहां से टिहरी के राजा लंबे समय तक टैक्स वसूलते थे. कैलाश मानसरोवर पर दावा करते हुए लोहिया कहते थे कि कोई भी समाज अपने देवी देवता दूसरे देश में स्थापित नहीं करता. इसलिए मानसरोवर का इलाका भारत का है. इसी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने हिमालय नीति बनाने पर जोर दिया और कहा कि भारत और चीन के बीच हिमालय की रक्षा करने से दोनों देशों के पर्यावरण की रक्षा होगी और शांति भी कायम रहेगी. जून 1954 में जब चीन के प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई ने भारत का दौरा किया और पंचशील समझौते पर दस्तखत किया तब भी उन्होंने भारत को सचेत किया. उसके ठीक बाद चीन ने यूपी के बाराहोली इलाके में भारतीय सेना की मौजूदगी पर आपत्ति शुरू कर दी. सन 1959 में जब चीन ने लद्दाख के स्पैंगूर और नेफा के लांग जू पर कब्जा किया तो नेहरू ने कहा कि वह पहाड़ी इलाका है और वहां कोई बसता नहीं. इस पर लोहिया ने उन्हें गद्दार तक कहा.

सबसे बुरी स्थिति तब पैदा हुई जब चीनी सेना ने 20 अक्टूबर 1962 को भारत पर हमला कर दिया. चीनी सेना ने ढोला और खिन्जमाने सेना शिविरों को नष्ट कर दिया और आगे घुसती चली गई. वे असम में काफी भीतर तक घुस आए. लोहिया को उस समय और आश्चर्य हुआ जब 26 अक्टूबर 1962 को संयुक्त राष्ट्र में भारतीय प्रतिनिधि ने हमले की अनदेखी करते हुए चीन की सदस्यता का समर्थन किया. इस पर लोहिया ने कहा कि आज मेरी आत्मा बहुत दुखी है. एक दशक तक लोहिया यही कहते रहे कि भारत को एक चीन सरकार की बजाय दो चीन सरकारों को मान्यता देनी चाहिए. एक चाउ की सरकार को और दूसरा चियांग को. उसके बाद लोहिया 1963 में लोकसभा में चुन कर पहुंचे और वे निरंतर नेहरू सरकार की चीन नीति पर हमलावर रहे.

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इन तीन विद्वानों की चेतावनियों में आज चीन और बाकी दुनिया के साथ मची खींचतान दिखाई पड़ रही है. कोविड-19 के बाद चीन ज्यादा ताकतवर होकर उभरा है. जहां भारत समेत ज्यादातर देशों की अर्थव्यवस्थाएं मंदी की शिकार हैं वहीं चीन के विकास की गति कायम है. उसका सरकारी अखबार `पीपुल्स डेली’ दावा कर रहा है कि चीन का विकास अमेरिका का उपहार नहीं है. उसे चीन के लोगों ने कड़ी मेहनत और अपनी प्रज्ञा से हासिल किया है. वह दावा कर रहा है कि दुनिया को अगर आगे बढ़ना है तो उसे चीन की मदद लेनी ही होगी. चीन ने अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पांपियो के उस बयान की कड़ी आलोचना की है जिसमें उन्होंने आसियान देशों से चीन का विरोध करने के लिए खड़े होने की अपील की है. चीन का कहना है कि अमेरिकी कंपनियां चीन में व्यापार करना चाहती हैं. अमेरिका से खींचतान के बीच चीन यूरोपीय संघ से अपना व्यापारिक रिश्ता कायम रखना चाहता है और इसीलिए अगले सोमवार को उसके राष्ट्रपति यूरोपीय संघ के नेताओं से वीडियो कांफ्रेंसिंग करेंगे.

यह सारी स्थितियां यही बताती हैं कि भारत समेत पूरी दुनिया को चीन को समझने और उससे मर्यादित और सुरक्षित व्यवहार प्राप्त करने में अब काफी तैयारी और चतुराई की जरूरत है. चीन के खिलाफ न तो अति आक्रामकता से काम चलने वाला है और न ही निश्चिंत होकर पंचशील का सिद्धांत मानने से. चीन दुनिया का संतुलन तेजी से बदल रहा है. उसमें सभी को संभल कर खड़ा होना पड़ेगा और इसमें भारत को विशेष तौर पर सतर्क रहना होगा. यहां आदर्शवाद नहीं चलेगा बल्कि व्यावहारिक रणनीति ही काम आएगी