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पिथौरागढ़- उत्तराखंड में मौत के मुहाने पर बैठे हैं 39 गांवों के लोग, CM रावत के दिलासे से पुनर्वास की जगी उम्मीद

पिथौरागढ़. मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत (Trivendra Singh Rawat) ने आपदा प्रभावित गांवों को वनभूमि (Forest Land) में बसाने (Village Settlement) की बात कही है. इसके बाद ये उम्मीद भी जगी है कि देर से ही सही लेकिन मौत के मुहाने पर बैठे हजारों लोगों को सुरक्षित आशियाना मिल सकता है. सिर्फ कुमाऊं के पहाड़ी जिलों में 39 गांव ऐसे हैं, जिन्हें प्रकृति के उग्र रूप का सामना करना पड़ सकता है. पहाड़ी इलाकों में शायद ही कोई ऐसी बरसात गुजरी हो, जिसने मौत का तांडव न मचाया हो. हर साल बादल फटने और भूस्खलन की घटनाओं ने कई गांवों का नामोनिशान तक मिटा दिया है. कुमाऊं में आपदा की सबसे अधिक मार पिथौरागढ़ (Pithoragarh), अल्मोड़ा, बागेश्वर और चम्पावत पर पड़ती है. इन जिलों में 39 ऐसे गांव हैं, जिन्हें तत्काल विस्थापन की दरकार है.

खास कर खतरे की जद में बसे सबसे अधिक गांव पिथौरागढ़ की धारचूला विधानसभा में है. धारचूला के हरीश धामी सुझाव देते हुए कहते हैं कि बेहतर होगा कि सरकार खतरे की ज़द वाले गांवों को तत्काल विस्थापित करे. अगर ये संभव नहीं है तो उन्हें उचित धनराशि दे दे, ताकि वो कहीं अन्य बस सकें. चाइना बॉर्डर के करीब पूरी तरह उजड़ चुके धापा गांव के आपदा प्रभावित जशपाल सिंह सरकार से तत्काल विस्थापित करने की मांग करते हुए कहते हैं आखिर कब तक उनके गांव के लोग राहत शिविरों में रहने को मजबूर होंगे. फ़िलहा, पिथौरागढ़ में 30 गांवों के 350 परिवार, बागेश्वर में 6 गांवों के 55 परिवार अल्मोड़ा में 2 गांवों के 50 परिवार और चम्पावत में 1 गांव के 9 परिवारों पर कभी भी आसमानी आफत कहर बरपा सकती है.

बरसात ने कई गांवों का वजूद मिटा डाला है
पिथौरागढ़ के बॉर्डर इलाकों में इस साल की बरसात ने कई गांवों का वजूद मिटा डाला है. हालात ये हैं कि मुनस्यारी में 525 और धारचूला-बंगापानी के 630 प्रभावित परिवार फिलहाल राहत शिविरों में दिन गुजार रहे हैं. पिथौरागढ़ की प्रभावित तहसीलों के 74 परिवारों को विस्थापित करने के लिए करीब 5 करोड़ के प्रस्ताव अब तक शासन को भेजे जा चुके हैं. डीएम पिथौरागढ़ विजय जोगदांडे की मानें तो विस्थापन को लेकर प्रस्ताव शासन को भेज दिया गया है. शासन से हरी झंडी मिलते ही विस्थापन की कार्रवाई शुरू कर दी जाएगी. अलग उत्तराखंड राज्य बने 20 साल होने को हैं. लेकिन अब तक भी विस्थापन को लेकर कोई ठोस नीति नही बन पाई है, जिस कारण हर साल बरसने वाली आसमानी आफत में दर्जनों लोग बेवक्त मौत के मुंह में समा जाते हैं.