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उत्तराखंड- बदरीनाथ का घर, चिपको आंदोलन की ज़मीन है चमोली… फूलों की घाटी और औली भी हैं यहीं

उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है तो इसमें चमोली की विशेष भूमिका है. उत्तराखंड की धरती हरे-भरे वनों से आच्छादित है तो इसमें भी चमोली की विशेष भूमिका है. उत्तराखंड को नदियों को प्रदेश कहा जाता है तो इसमें भी चमोली की विशेष भूमिका है, उत्तराखंड को इसकी खूबसूरता के लिए जाना जाता है तो चमोली की खूबसूरती का इसमें योगदान है. चमोली बदरीनाथ का घर है, चमोली चिपको आंदोलन की ज़मीन है, चमोली अलकनंदा का स्थान है जो देवप्रयाग में भागीरथी से मिलकर गंगा बनती है और फूलों की घाटी और औली भी चमोली में ही है जो अपनी खूबसूरती के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है.

हिमालय के सबसे पुराने तीर्थों में शामिल और भारत के प्रसिद्ध चार धामों में एक बदरीनाथ धाम चमोली में ही है. बदरीनाथ धाम ऐसा धार्मिक स्थल है, जहां नर और नारायण दोनों मिलते हैं. माना जाता है कि इस धाम की स्थापना सतयुग में हुई थी. यही कारण है, कि इस धाम का माहात्मय सभी प्रमुख शास्त्रों में पाया गया है. मंदिर के निकट ही एक कुंड है, जिसका जल सदैव गरम रहता है.

स्थानीय लोगों का मानना है कि कुछ वर्षों पश्चात जोशीमठ से बदरीनाथ की सड़क मंदिर के पास पहाड़ी मिलने से बंद हो जाएगी और तब यह मंदिर तीर्थ यात्रा का स्थान. यहां भगवान विष्णु की मूर्ति काले पत्थर से बनी हुई है, यह एक मीटर ऊंची है. विष्णु बदरीनाथ का एक और नाम है इसलिए इस मंदिर को आदिबदरी भी कहा जाता है. यह पंच बदरी में से एक है, जो हैं- विशाल बदरी, योग-ध्यान बदरी, वृद्ध बदरी और भविष्य बदरी.
आदिबदरी

भविष्य के बदरीनाथ भविष्य बदरी का मंदिर उपन में है, जो जोशीमठ से लगभग 17 किलोमीटर दूर है. यह तपोवन से दूसरी तरफ है और धौलीगंगा नदी के ऊपर लगभग 3 किलोमीटर का ट्रैक करके यहां पहुंचा जा सकता है. माना जाता है कि कलयुग की शुरुआत में जोशीमठ में नरसिंह की मूर्ति का हाथ अंततः गिर जाएगा जिसके बाद विष्णुप्रयाग के पास पतमिला में जय और विजय पहाड़ गिर जाएंगे. इससे बदरीनाथ धाम में जाने का मार्ग बहुत ही दुर्गम हो जाएगा. परिणामस्वरूप बदरीनाथ भगवान करी पूजा भविष्य बदरी में की जाएगी. विष्णु के अवतार कल्की कलयुग को समाप्त करेंगे और फिर सतयुग की शुरुआत होगी.

चमोली में हिंदुओं के बहुत से तीर्थ और मंदिर हैं और इसके साथ ही सिखों का पवित्र गुरुद्वारा हेमकुंड साहिब भी है. हेमकुंड साहिब एक बर्फ़ीली झील के किनारे सात पहाड़ों के बीच स्थित है. इन सात पहाड़ों पर निशान साहिब झूलते हैं. इस तक ऋषिकेश-बद्रीनाथ साँस-रास्ता पर पड़ते गोबिन्दघाट से केवल पैदल चढ़ाई से ही पहुंचा जा सकता है.

इस दर्शनीय तीर्थ में चारों ओर से बर्फ़ की ऊंची चोटियों का प्रतिबिम्ब विशालकाय झील में पड़ता है बेहद खूबसूरत लगता है. इसी झील में हाथी पर्वत और सप्त ऋषि पर्वत श्रृंखलाओं से पानी आता है. एक छोटी जलधारा इस झील से निकलती है जिसे हिमगंगा कहते हैं. झील के किनारे स्थित लक्ष्मण मंदिर भी अत्यन्त दर्शनीय है. काफ़ी ऊंचाई पर होने के कारण साल लगभग 7 महीने इस झील बर्फ में जम जाती है.

धार्मिक पर्यटन के अलावा ओली को इसकी प्राकृतिक खूबसूरती के लिए भी जाना जाता है. हालांकि सभी मंदिर और धार्मिक स्थल खुद ही बेहद मनमोहक प्राकृतिक सौंदर्य के बीच स्थित हैं लेकिन सिर्फ़ खूबसूरती के लिए भी यहां बहुत की जगहें जानी जाती हैं. इनमें दो नाम सबसे उल्लेखनीय हैं औली और फूलों की घाटी.

चमोली की पहाड़ियों पर स्थित औली विंटर गेम्स का देश का एक प्रमुख स्थान है. स्थानीय भाषा में औली को बुग्याल यानी ‘घास का मैदान’ कहा जाता है. औली जोशीमठ से सड़क या रोपवे से पहुंचा जा सकता है. यहां से नंदादेवी, कमेट तथा दूनागिरी जैसे विशाल पर्वत चोटियों का मनोहारी दृश्य दिखता है.

आमतौर पर जनवरी से मार्च तक औली की ढलानों पर लगभग 3 मीटर तक बर्फ की चादर बिछी होती है. औली में स्थित 500 मीटर के ढलान के साथ 3 किमी विस्तार वाला मैदान अंतर्राष्टीय मानक के अनुसार एक बहुत अच्छा स्कीइंग ग्राउंड माना जाता है. औली को पर्यटन मानचित्र पर लाने के लिए यहां स्कीइंग महोत्सव का भी आयोजन किया जाता है.

चमोली में हिमाच्छादित पर्वतों से घिरी हुई एक घाटी है जहां फूलों की 500 से ज़्यादा प्रजातियां पाई जाती हैं. इस घाटी को यूनेस्कों ने विश्व धरोहर सथल घोषित किया है. हर साल हज़ारों की संख्या में लोग इस घाटी की खूबसूरती का दीदार करने इसे खोजने आते हैं.

कहा जाता है कि यह वही जगह है जहां हनुमानजी लक्ष्मण की मूर्छा तोड़ने के लिए संजीवनी बूटी लेने आए थे. ‘रामायण और महाभारत’ में इसका वर्णन नंदकानन के नाम से मिलता है. हालांकि आधुनिक भारत में इसकी खोज एक ब्रिटिश पर्वतारोही फ़्रैंक स्मिथ ने की थी. 1931 में अपने कामेट पर्वतारोहण अभियान से लौटते समय स्मिथ और उनके एक साथी इस घाटी से होकर गुज़रे थे. इसकी खूबसूरती से प्रभावित स्मिथ 1937 में यहां वापस लौटे और 1968 में ‘वैली ऑफ फ्लावर्स’ नाम से एक किताब लिखी. उसके बाद यह खूबसूरत घाटी दुनिया की नज़र में आई.

राजनीतिक दृष्टि से चमोली का महत्व अब बढ़ गया है क्योंकि चमोली में गैरसैंण के उत्तराखंड सरकार ने ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने का ऐलान कर दिया है. हालांकि उत्तराखंड आंदोलन के समय से ही राजधानी गैरसैंण में बनाने की मांग होती रही थी क्योंकि यह गढ़वाल और कुमाऊं के बीच में है.

ग्रीष्मकालीन राजधानी बनने के बाद तय है कि चमोली का राजनीतिक महत्व भी बढ़ेगा और विकास भी होगा. वैसे प्रशासनिक दृष्टि से देखें तो चमोली अकेला ऐसा ज़िला है जिसका मुख्यालय चमोली तहसील में नहीं गोपेश्वर में है. गैरसैंण प्रदेश की राजधानी के रूप में विकसित होता है तो ज़िला मुख्यालय गैरसैंण में हो सकता है.