प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि बहू पर सास-ससुर के भरण-पोषण की कानूनी जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती। कोर्ट ने कहा कि नैतिक जिम्मेदारी और कानूनी जिम्मेदारी अलग-अलग होती हैं।
यह मामला एक बुजुर्ग दंपती से जुड़ा था, जिन्होंने अपने बेटे की मृत्यु के बाद अपनी बहू से गुजारा भत्ता देने की मांग की थी। हालांकि, पहले फैमिली कोर्ट और बाद में हाईकोर्ट ने भी उनकी याचिका खारिज कर दी।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि संबंधित कानून की धारा 144 के तहत सास-ससुर को इस दायरे में शामिल नहीं किया गया है, इसलिए बहू को कानूनी रूप से इसके लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भले ही पारिवारिक रिश्तों में नैतिक जिम्मेदारियां महत्वपूर्ण होती हैं, लेकिन जब तक कानून में स्पष्ट प्रावधान न हो, तब तक किसी पर कानूनी दायित्व नहीं थोपा जा सकता।
इस फैसले के बाद सामाजिक और कानूनी हलकों में बहस तेज हो गई है कि रिश्तों में नैतिकता और कानून की सीमाएं कहां तक तय होनी चाहिए।
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