UP Desk: मृत्यु एक ऐसा सच है जिससे कोई नहीं बच सकता, लेकिन क्या आप जानते हैं कि जब डॉक्टर किसी इंसान को मृत घोषित कर देते हैं, तब भी उसके शरीर के भीतर की दुनिया पूरी तरह शांत नहीं होती? मेडिकल साइंस के अनुसार, मौत के बाद भी शरीर के कई अंग घंटों और दिनों तक जीवित रह सकते हैं। यह जानकारी न केवल चौंकाने वाली है, बल्कि अंगदान (Organ Donation) के जरिए दूसरों को जीवनदान देने के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है।
आखिर मौत के बाद क्या होता है?
डॉक्टर आमतौर पर दो स्थितियों में मौत की घोषणा करते हैं कि सर्कुलेटरी डेथ (जब दिल धड़कना बंद कर दे) और ब्रेन डेथ (जब दिमाग पूरी तरह काम करना बंद कर दे)। मौत होते ही शरीर में ऑक्सीजन और खून की सप्लाई रुक जाती है, जिससे अंगों को ऊर्जा मिलना बंद हो जाती है। हालांकि, हर अंग के खराब होने की रफ्तार अलग-अलग होती है।
कौन सा अंग कितनी देर तक रहता है ‘जीवित’?
मेडिकल स्टडीज और ऑर्गन डोनेशन प्रोटोकॉल के अनुसार, अंगों के बेकार होने का समय कुछ इस प्रकार है:
– दिमाग (Brain),4 से 6 मिनट,सबसे पहले दिमाग की कोशिकाएं मरती हैं।
– दिल (Heart),4 से 6 घंटे,ऑक्सीजन की कमी होते ही यह जल्दी बेकार हो जाता है।
– फेफड़े (Lungs),4 से 6 घंटे,सांस रुकने के साथ ही इनकी क्षमता गिरने लगती है।
– लीवर (Liver),8 से 12 घंटे,”इसमें एंजाइम ज्यादा होते हैं, इसलिए सड़न जल्दी शुरू होती है।”
– किडनी (Kidney),24 से 36 घंटे,यह काफी मजबूत अंग है और लंबे समय तक सुरक्षित रहता है।
– आंखें (Cornea),14 दिन तक,”यह ऑक्सीजन पर कम निर्भर है, इसलिए सबसे देर में खराब होती है।”
– त्वचा और हड्डियां,कई दिनों तक,इन्हें फ्रीज करके लंबे समय तक इस्तेमाल किया जा सकता है।
सड़ने की प्रक्रिया: कब क्या होता है?
अंगों के काम बंद करने के बाद शरीर में सड़न (Decomposition) शुरू होती है। सबसे पहले वे अंग सड़ते हैं जिनमें एंजाइम और बैक्टीरिया ज्यादा होते हैं, जैसे आंतें और अग्न्याशय (Pancreas)। अगर शरीर को ठंडे वातावरण या ‘कोल्ड स्टोरेज’ में रखा जाए, तो अंगों को खराब होने से कुछ और समय के लिए बचाया जा सकता है।
अंगदान: एक मौत, आठ जिंदगियां
भारत में हर साल लाखों लोग अंगों की कमी के कारण जान गंवा देते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर सही समय पर (गोल्डन ऑवर के भीतर) अंग निकाल लिए जाएं, तो एक मृत व्यक्ति का दिल, लीवर, फेफड़े और किडनी कई लोगों को नई जिंदगी दे सकते हैं। ब्रेन डेथ के मामलों में मशीनों के जरिए अंगों को ज्यादा समय तक जीवित रखा जा सकता है ताकि वे जरूरतमंदों के काम आ सकें।
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