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ईंट-भट्ठों के लिए पर्यावरण मंजूरी अनिवार्य, लेकिन प्रक्रिया तय नहीं-उठे सवाल


लखनऊ: उत्तर प्रदेश में ईंट-भट्ठा संचालकों के लिए पर्यावरणीय मंजूरी अनिवार्य कर दी गई है, लेकिन इसकी प्रक्रिया तय न होने से असमंजस की स्थिति बनी हुई है। पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि सरकार ने आदेश तो जारी कर दिया, लेकिन उसे लागू करने के लिए कोई ठोस व्यवस्था अब तक नहीं बनाई गई है।

तीन महीने बाद भी नहीं बनी प्रक्रिया
राज्य सरकार ने 16 दिसंबर 2025 को आदेश जारी कर ईंट-भट्ठों के लिए मिट्टी खोदने जैसी गतिविधियों हेतु पर्यावरणीय मंजूरी लेना अनिवार्य कर दिया था। हालांकि, तीन महीने से अधिक समय बीतने के बावजूद आवेदन की कोई स्पष्ट प्रक्रिया—न ऑनलाइन और न ही ऑफलाइन—तय नहीं की गई है।

खनन विभाग की चुप्पी
इस पूरे मामले में खनन विभाग की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, जिससे स्थिति और अस्पष्ट हो गई है।

संचालकों ने रखी सरल प्रक्रिया की मांग
ईंट-भट्ठा संचालकों का कहना है कि वे पहले से ही जल और वायु गुणवत्ता मानकों के तहत राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से अनुमति लेते हैं और खनन विभाग को शुल्क भी देते हैं। उनका कहना है कि अगर पर्यावरण विभाग से भी मंजूरी लेनी है, तो प्रक्रिया आसान और पारदर्शी होनी चाहिए, ताकि बिचौलियों की भूमिका खत्म हो सके।

2020 में मिली थी छूट
पर्यावरण कार्यकर्ताओं के अनुसार, वर्ष 2020 से पहले ईंट-भट्ठा संचालक पर्यावरण मंजूरी लेते थे। लेकिन 1 मई 2020 की अधिसूचना में दो मीटर तक सामान्य मिट्टी की खुदाई को मंजूरी से छूट दे दी गई थी, जिससे यह प्रक्रिया बंद हो गई।

अदालतों के फैसलों के बाद बदला रुख
अधिवक्ता राजीव कुमार बाजपेयी ने बताया कि बिहार सरकार की इसी तरह की अधिसूचना को 7 मार्च 2024 को पटना हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी 22 जुलाई 2024 को बरकरार रखा। इसके बाद केंद्र सरकार ने सभी राज्यों को निर्देशों का पालन करने की सलाह दी।

याचिका के बाद सरकार ने लिया फैसला
बाजपेयी ने बताया कि अगस्त 2025 में उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में जनहित याचिका दायर की थी। इसके बाद सरकार ने 16 दिसंबर 2025 को नया आदेश जारी कर पर्यावरण मंजूरी को फिर से अनिवार्य कर दिया।

विशेषज्ञों ने जताई चिंता
पर्यावरण से जुड़े अधिवक्ता अरविंद कुमार राय का कहना है कि आदेश के बावजूद प्रक्रिया तय न होना बड़ी प्रशासनिक कमी को दर्शाता है। इससे न सिर्फ उद्योग प्रभावित हो रहा है, बल्कि पर्यावरणीय नियमों का सही क्रियान्वयन भी नहीं हो पा रहा।

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