उत्तर प्रदेश। प्रदेश समेत देशभर में आम अभिभावक निजी स्कूलों की बढ़ती मनमानी से परेशान नजर आ रहे हैं। महंगी फीस, किताबों और यूनिफॉर्म के नाम पर हो रही वसूली को लेकर अभिभावकों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है।
महान विचारक स्वामी विवेकानंद ने शिक्षा को मनुष्य निर्माण का माध्यम बताया था, न कि धन कमाने का जरिया। वहीं डॉ. भीमराव आंबेडकर का मानना था कि शिक्षा समाज में समानता और न्याय स्थापित करने का साधन है। लेकिन वर्तमान परिदृश्य में कई निजी स्कूलों पर इन मूल्यों से भटकने के आरोप लग रहे हैं।
अभिभावकों का कहना है कि प्राइवेट स्कूल निजी प्रकाशकों के साथ मिलकर महंगी किताबें खरीदने के लिए मजबूर करते हैं। बाजार में सस्ती और वैकल्पिक किताबें उपलब्ध होने के बावजूद स्कूल विशेष दुकानों से ही खरीदने का दबाव बनाते हैं।
इसके अलावा यूनिफॉर्म को लेकर भी शिकायतें सामने आ रही हैं। कई स्कूलों द्वारा तय दुकानों से ही यूनिफॉर्म खरीदने की अनिवार्यता से अभिभावकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है।
📌 सरकार के नियम क्या कहते हैं?
स्कूल किसी एक दुकान से किताबें या यूनिफॉर्म खरीदने के लिए बाध्य नहीं कर सकते
एनसीईआरटी या मानक पुस्तकों को प्राथमिकता देने का निर्देश
मनमानी फीस वसूली पर नियंत्रण के लिए नियम लागू
⚠️ अभिभावक क्या करें?
स्कूल की शिकायत जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) से करें
फीस और किताबों की रसीद जरूर लें
अभिभावक संघ बनाकर सामूहिक आवाज उठाएं
जरूरत पड़ने पर उपभोक्ता फोरम का सहारा लें
अभिभावकों का कहना है कि यदि समय रहते इस पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह से आम आदमी की पहुंच से बाहर हो जाएगी।
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